कहीं कोरोना से भी गंभीर ना बन जाए श्रमिकों का मामला

कहीं कोरोना से भी गंभीर ना बन जाए श्रमिकों का मामला

पैदल लौटते हुए बीमारी की चपेट में आए तो खड़ा हो जाएगा बड़ा संकट
कई राज्यों और शहरों में इन श्रमिकों के बल पर चलते हैं उद्योग, प्रतिष्ठान और होटल

रामभक्त वालिया वरिष्ठ पत्रकार, सहारनपुर
सहारनपुर। हजारों किलोमीटर चलकर पैदल घरों को लौट रहे श्रमिकों का मामला भी सरकार के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है। क्योंकि, स्वाभाविक है कि इतने लंबे सफर में पैदल चलकर जा रहे लोगों को सही समय पर खाना और दवा आदि न मिलने पर शरीर कमजोर हो जाएंगे। ऐसे लोगों की प्रतिरोधक क्षमता घट जाएगी।
उधर, ऐसी स्थिति में बीमार होने के साथ ही ईलाज के अभाव में इनकी दुर्दशा होने की बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में बीमार होने की स्थिति में कोरोना वायरस से बड़ा संकट दूर-दूराज के श्रमिक बन सकते हैं। क्यो‌ंकि, इनकी संख्या लाखों में है और बीमार हुए तो सरकारों के सामने भी बड़ी परेशानी खड़ी हो जाएगी। ऐसी परिस्थितियों में क्या हालात होंगे, यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। क्योंकि, जहां के यह लोग रहने वाले हैं, वहां तो पहले ही बेरोजगारी और रोजी-रोटी का संकट होने की बातें किसी से छिपी नहीं है। यदि ऐसा ना होता तो यह लोग पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हजारों किलोमीटर दूर से रोजगार की तलाश में क्यों आते।
हालात इस बात के संकेत दे रहे हैं, कि खासतौर से इन श्रमिकों का भविष्य आगे ज्यादा खतरे में है। सरकार इनके भेजने की व्यवस्था तो कर रही है, लेकिन वह भी नाकाफी नजर आ रही है। अगर माकूल व्यवस्था होती तो इन श्रमिकों को अपने घरों तक जाने के लिए सैकड़ों हजारों किलोमीटर का पैदल सफर करने के लिए मजबूर ना होना पड़ता। हजारों की संख्या में पैदल श्रमिक अपने परिवार के साथ अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं। जिलों की सीमाओं पर कड़ा पहरा होने की वजह से मशक्कत के बावजूद श्रमिक असहज भी नजर आ रह हैं। इस वजह से ऐसे श्रमिक सहारनपुर में इधर-उधर भटकते देखे जा सकते हैं।



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शासन ने व्यवस्था तो की, पर नाकाफी
सहारनपुर। देहरादून रोड, दिल्ली-यमुनोत्री हाईवे, अंबाला हाईवे पर बड़ी संख्या में श्रमिक दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, शासन ने भी बड़ी संख्या में बसें लगाकर इनकों घर भेजन की व्यवस्था की है, लेकिन इसके बावजूद भी पूरी तरह श्रमिकों को राहत नहीं मिल रही है। ऐसी स्थिति में  कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आज के हालात बयां कर रहे हैं कि कोरोना ने तो पूरे विश्व को हिला कर रख दिया, लेकिन अपने घरों तक पहुंचने पर यह श्रमिक बीमारियों से घिर गए गए तो सरकार कैसे संभालेगी, यह अपने आप में एक बड़ा सोचनीय विषय है?
लॉकडाउन को अभी 50 दिन के लगभग हुए हैं। अगर इन श्रमिकों को वहीं रोक दिया जाता, जहां यह काम करते और रहने व खाने की व्यवस्था होती तो ऐसी ‌स्थिति शायद ना बनती।



एनर्जी के लिए समय पर मिले खाना और दवाएंः चिकित्सक
सहारनपुर। डाक्टर बलजीत मनचंदा और डाक्टर संजय वालिया का कहना है कि पैदल लंबे रास्तों को तय कर रहे श्रमिकों की रोग प्रतिरोधात्क क्षमता घटना शरीर के हिसाब से स्वाभिवक है। ऐसे में इन्हें 24 घंटे में दो बार पर्याप्त भोजन और हर एक से दो किलोमीटर पर स्वच्छ पानी के साथ ही रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने वाली दवाएं मिलें। चिकित्सकों ने सलाह दी कि पैदल चलें, लेकिन एक दिन में पांच से दस किलोमीटर का ही सफर तय करें। अगर संभव हो तो इसके बाद पूरी नींद लें और भोजन कर ही दोबारा अपने गंतव्य की ओर बढ़ें।



दोबारा लौटने की नहीं उम्मीद
सहारनपुर। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश में बड़े-बड़े उद्योगों, फैक्टरियों, होटलों, प्रतिष्ठानों पर पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार के श्रमिक ही काम करते थे। अब कोरोना की वजह से कामकाज बंद होने पर इनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हुआ तो यह अपने घरों को वापिस लौट गए, लेकिन दोबारा वापिस आने की स्थिति में भी अब श्रमिक नहीं है। ऐसे में बंद हो चुकी ईकाइयों को ‌फिर से शुरू करने में संकट का सामना करना पड़ेगा। सहारनपुर के रास्ते बिहार जा रहे मनीपाल, राजेश कुमार, रेखा कुमार ने बताया कि फिलहाल तो उन्हें अपने घर लौटने की चिंता है और वापिस आने के बारे में वह सोच भी नहीं रहे हैं। कोशिश करेंगे कि जहां के रहने वाले हैं, वहीं रोजगार मिल जाए और उन्हें हरियाणा, पंजाब, दिल्ली सहित अनेक प्रदेशों में काम की तलाश में न आना पड़े।

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