ऑपरेशन सना: तीन साल की सना ज़मीन के नीचे 110 फीट गहरे गड्ढे में कई घंटों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही।

ऑपरेशन सना: तीन साल की सना ज़मीन के नीचे 110 फीट गहरे गड्ढे में कई घंटों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही।

रिपोर्ट: फराह अंसारी
बिहार: हिंदुस्तान के नक्शे में बना ये गड्ढा हमें इस बात का अहसास करा रहा है कि सालों से हमने सिर्फ शिकायतें की हैं। मगर सीखा कुछ नहीं। यही वजह है कि हर साल ना जाने कितने ही बच्चे इन गड्ढों में जा गिरते हैं। कुछ इन अंधेरे गड्ढों से बच कर निकल आते हैं, तो कुछ उसी में दम तोड़ देते हैं। दो- चार दिन शोर होता हैं. फिर हम सब भूल जाते हैं। तब तक जब तक कि अगला कोई गड्ढे में ना गिर जाए। और इस बार तीन साल की सना की बारी थी।सना ज़मीन के नीचे 110 फीट गहरे गड्ढे में थी। वो कई घंटों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही।



बस एक फीट चौड़ा घुप अंधेरा गड्ढ़ा और उस गड्ढ़े में 110 फीट नीचे फंसी उस मां की 3 साल की मासूम बच्ची। अंदर वो कभी डरती है. कभी घबराती है। कभी रोने लगती है। बार बार कहती जाती है। मम्मी प्लीज़ मुझे निकालो। यहां बहुत डर लग रहा है। वो मजबूर मां भी क्या करे। 110 फीट गहरे गड्ढ़े से अपने जिगर के टुकड़े को निकाले भी तो निकाले कैसे। जब कुछ नहीं समझ आता तो इसी गड्ढ़े में मुंह घुसाकर अपनी बच्ची को दिलासा देने लगती है।

बार-बार कहती है बेटी घबराना नहीं हम यहीं हैं। तुम्हारे पास। तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।निकाल लेंगे। हम यहीं हैं। पर गड्ढ़े से ज़रा सी देर के लिए भी जैसे ही कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती तो ये बेबस मां दौड़कर उस टीवी स्क्रीन की तरफ भागती जिसमें सीसीटीवी की तस्वीर नज़र आ रही है। तस्वीर देखती तो तसल्ली मिलती। मगर फिर जैसे ही टीवी पर दिखती बच्ची हरकत करना बंद कर देती तो ये मां पत्रकारों के सामने हाथ जोड़ने लगती। बस एक गुज़ारिश करती कुछ भी करो। कैसे भी करो। मेरी बच्ची को बचा लो।

गड्ढे के अंदर जो क्लोज़ सर्किट कैमरा डाला गया है, उससे ये मंज़र दिखाई दे रहा है। बोरवेल के लिए खोदा गया गड्ढ़ा। जिसमें आधी जगह तो पानी निकलाने वाले इस पाइप ने घेर रखी है। और बाकी बची जगह में सिमटी हुई ये बच्ची है। सिर्फ हाथ की उंगलियों में होने वाली जुंबिश ही ये इशारा दे रही हैं कि बच्ची अभी ज़िंदा है। वरना पूरा जिस्म कीचड़ में इस तरह सना हुआ है कि समझ नहीं आ रहा है कि सिर कहां और पैर कहां।

बिहार के मुंगेर में मंगलवार को दोपहर करीब 3 बजे 3 साल की मासूम सना इस बोरवेल में गिरी और तब से ही पूरा का पूरा परिवार इस बोरवेल के पास और पड़ोसी घर के बाहर जमा हैं। प्रशासनिक अमले ने भी पूरी मुस्तैदी दिखाई और फौरन मौके पर पहुंच कर बोरवेल में ऑक्सिज़न पाइप पहुंचाई गई ताकि सना की सांसें चलती रहें। दवाइयां और पानी भी लगातार दिया जा रहा था।

दिन तो रोते पीटते और फरियाद करते करते बीत गया। मगर जब रात आई तो मां और ज्यादा घबराने लगी। बच्ची को रातभर जगाए भी नहीं रखना चाहती थी। और सोने भी नहीं देना चाहती थी। क्योंकि 110 फीट नीचे बोरवेल में अगर सना की आवाज़ थम जाती, तो इधर घरवालों की सांसे थमने लगतीं।

मंगलवार की रात सना की मां का रो-रोकर बुरा हाल था। अपनी बेटी को हौसला दिलाने के लिए वो हर मुमकिन जतन रातभर करती रही। हर थोड़ी-थोड़ी देर में वो बच्ची को दिलासा देती रही। घबराना नहीं सना हम यहीं हैं। किसी तरह रात बीती और बुधवार की सुबह हुई और फिर शुरू हुआ बच्ची को बोरवेल से निकालने का ऑपरेशन।

सना की जिंदगी अब पुलिस, प्रशासन और रेस्क्यू टीम के रहमो-करम पर थी। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सेना मौके पर थी। अब इस टीम को जमीन के नीचे 110 फीट गहरे गड्ढे में उतरना था। मगर उतरने के लिए रास्ता तो होना चाहिए ना और रस्ता था नहीं। लिहाजा हेमशा की तरह पहले रास्ता बनाया गया और ये रास्ता बना सड़क को खोद कर।

बुधवार

की सुबह होते ही मुंगेर के मुर्गियाचक मोहल्ले में सेना और प्रशासन की चहल पहल बढ़ने लगी। बेहद घना इलाका होने की वजह से रेस्क्यू टीम के पास इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं था कि इस सड़क को ही खोदकर घर की उस जगह तक पहुंचा जाए जहां सना नीचे फंसी हुई थी। जेसीबी मशीन के ज़रिए सड़क खोदने का काम यूं तो रात में ही शुरू हो गया था। मगर सुबह होते होते ये काम युद्ध स्तर पर चलने गया। कई टीमों ने मिलकर चंद घंटों में ही सड़क पर लंबा चौड़ा गड्ढ़ा खोद डाला।

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