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गीतकार जावेद अख्तर से खफा हुए देवबंदी उलमा, बोले- दो मिनट की आजान से क्या परेशानी?

सहारनपुर।
बॉलीवुड के प्रसिद्ध लेखक व गीतकार जावेद अख्तर के लाउडस्पीकर पर अजान देने का विरोध करने पर देवबंदी उलमा ने सख्त नाराजगी जताई है। मदरसा जामिया शेखुल हिंद के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती असद कासमी का कहना है कि देश के संविधान ने सभी को धार्मिक आजादी दी हुई है। इसलिए अजान का विरोध संविधान का विरोध है। हर कोई आजान के ही पीछे क्यों है?
उन्होंने कहा कि देश में सभी धर्म के लोग अपने अपने धार्मिक स्थलों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करते हैं। हिन्दू ,सिख ईसाई लेकिन जावेद अख्तर का सिर्फ अजान को लेकर विरोध जताना समझ से परे हैं, जबकि मस्जिदों से जो अजान दी जाती है वह कुछ मिनट की होती है। उससे किसी को परेशानी हो ऐसा नहीं लगता।



तंजीम अबना-ए-दारुल उलूम के अध्यक्ष मुफ्ती यादे इलाही कासमी व मुफ्ती तारिक का कहना है कि जिन बस्तियों में कम आबादी होती है और मस्जिद छोटी होती हैं, वहां पर बिना लाउडस्पीकर के भी अजान दी जाती हैं। लेकिन जहां पर आबादी ज्यादा हो वहां पर लाउडस्पीकर से ही अजान देकर लोगों को यह बताया जाता है कि नमाज का वक्त हो गया है। जावेद अख्तर को इससे क्या परेशानी हैं। उन्होंने अपनी बात में इसका जिक्र नहीं किया। गीतकार जावेद अख्तर ने शनिवार को एक ट्वीट किया। जिसमें लिखा कि अजान ठीक है, लेकिन लाउडस्पीकर दूसरों के लिए असुविधा का कारण बनता है। आगे उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकर का इस्तेमाल चिंता की बात है, वह चाहे मंदिर हो या मस्जिद।

उन्होंने कहा कि जब आजान होती है दुनिया में हज़ार किस्म की आसमानी आफतें और बुराइयां खत्म होती है इससे मुसलमानों की नही बल्कि पूरी कायनात के लोगों को फायदा पहुंचता है और उन्होंने कहा यह दुनिया इंसानों की बनाई हुई नही है यह दुनिया उस रब की बनाई हुई है जिसनें सारी कायनात बनाई है अगर कायनात के उस रब को याद करने के लिए लोगों को अज़ान कर बताया जाए की आओ इंसानियत की तरफ और अपने रब को याद करो तो इसमें आखिर बुराई क्या है?



आइये हम बताते है आखिर अज़ान है क्या इसका सही अर्थ क्या है?

सबसे पहले आपको यह बता दें की दुनिया के कुछ 4,300 धर्म हैं। यह अनुयायियों के अनुसार, एक स्वतंत्र, गैर-धार्मिक रूप से संबद्ध संगठन है जो दुनिया के धर्मों की संख्या और आकार की निगरानी करता है।

एक धर्म का गठन करने के मुद्दे को साइड-स्टेपिंग करते हुए, अनुयायी धर्मों को चर्चों, संप्रदायों, मंडलियों, धार्मिक निकायों, विश्वास समूहों, जनजातियों, संस्कृतियों और आंदोलनों में विभाजित करते हैं। सभी अलग-अलग आकार और प्रभाव के होते हैं।

दुनिया की लगभग 75 प्रतिशत आबादी दुनिया के पांच सबसे प्रभावशाली धर्मों में से एक है: बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, हिंदू धर्म, इस्लाम और यहूदी धर्म।



ईसाई धर्म और इस्लाम दो धर्म हैं जो दुनिया भर में सबसे अधिक फैले हुए हैं। ये दोनों धर्म मिलकर दुनिया की आधी से अधिक आबादी के धार्मिक जुड़ाव को कवर करते हैं। यदि सभी गैर-धार्मिक लोगों ने एक ही धर्म का गठन किया, तो यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा होगा।

अंग्रेजी बोलने वाले देशों में सबसे व्यापक रूप से आयोजित मिथकों में से एक यह है कि इस्लामी विश्वासी अरब हैं। वास्तव में, अधिकांश इस्लामी लोग मध्य पूर्व के अरबी देशों में नहीं रहते हैं।

दुनिया के 20 सबसे बड़े धर्म और उनके विश्वासियों की संख्या है:

ईसाई धर्म (2.1 बिलियन)
इस्लाम (1.3 बिलियन)
नॉनग्रीगल (धर्मनिरपेक्ष / अज्ञेयवादी / नास्तिक) (1.1 बिलियन)
हिंदू धर्म (900 मिलियन)
चीनी पारंपरिक धर्म (394 मिलियन)
बौद्ध धर्म 376 मिलियन
प्राइमल-स्वदेशी (300 मिलियन)
अफ्रीकी पारंपरिक और प्रवासी (100 मिलियन)
सिख धर्म (23 मिलियन)
जुचे (19 मिलियन)
आध्यात्म (15 मिलियन)
यहूदी धर्म (14 मिलियन)
बहाई (7 मिलियन)
जैन धर्म (4.2 मिलियन)
शिंटो (4 मिलियन)
काओ दाई (4 मिलियन)
पारसी धर्म (2.6 मिलियन)
टेनरिक्यो (2 मिलियन)
नव-मूर्तिवाद (1 मिलियन)
यूनिटेरियन-यूनिवर्सलिज्म (800,000)

अज़ान लाउड स्पीकर पर होनी चाहिए या नहीं, इसको लेकर इन दिनों चर्चा गर्म है। इस मुद्दे से एक बात की तरफ ध्यान जाता है कि आखि़र अज़ान है क्या? और अज़ान हमसे क्या कहती है? पूरी अज़ान का अर्थ क्या है? और क्या है इसका इतिहास।

अज़ान का इतिहास : मदीना में जब सामूहिक नमाज़ पढ़ने के मस्जिद बनाई गई तो इस बात की जरूरत महसूस हुई कि लोगों को नमाज़ के लिए किस तरह बुलाया जाए, उन्हें कैसे सूचित किया जाए कि नमाज़ का समय हो गया है। मोहम्मद साहब ने जब इस बारे में अपने साथियों सहाबा से राय मश्वरा किया तो सभी ने अलग अलग राय दी। किसी ने कहा कि प्रार्थना के समय कोई झंडा बुलंद किया जाए। किसी ने राय दी कि किसी उच्च स्थान पर आग जला दी जाए। बिगुल बजाने और घंटियाँ बजाने का भी प्रस्ताव दिया गया, लेकिन मोहम्मद साहब को ये सभी तरीके पसंद नहीं आए।



रवायत है कि उसी रात एक अंसारी सहाबी हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ैद ने सपने में देखा कि किसी ने उन्हें अज़ान और इक़ामत के शब्द सिखाए हैं। उन्होंने सुबह सवेरे पैगंबर साहब की सेवा में हाज़िर होकर अपना सपना बताया तो उन्होंने इसे पसंद किया और उस सपने को अल्लाह की ओर से सच्चा सपना बताया।

पैगंबर साहब ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ैद से कहा कि तुम हज़रत बिलाल को अज़ान इन शब्‍दों में पढ़ने की हिदायत कर दो, उनकी आवाज़ बुलंद है इसलिए वह हर नमाज़ के लिए इसी तरह अज़ान दिया करेंगे। इस तरह हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु इस्लाम की पहली अज़ान कही।

अज़ान के प्रत्येक बोल के बहुत गहरे मायने हैं। मुअज्जिन (जो अज़ान कहते हैं) अज़ान की शुरुआत करते हुए कहते हैं कि अल्लाहु अकबर। याने ईश्वर महान हैं। अज़ान के आखिर में भी अल्लाहू अकबर कहा जाता है और फिर ला इलाहा इल्लाह के बोल के साथ अज़ान पूरी होती है। याने ईश्वर के सिवाए कोई माबूद नहीं।

अज़ान की शुरुआत और उसका मुकम्मल अल्लाह की महानता के साथ होता है, जबकि इसके बीच के बोल अज़ान की अहमियत पर रौशनी डालते हैं। आइए पूरी अज़ान के अर्थ पर एक नज़र डालते हैं।



अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर
अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर

ईश्वर सब से महान है।

अश-हदू अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह
अश-हदू अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह

मैं गवाही देता हूं कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा इबादत के योग्य नहीं।

अश-हदू अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह
अश-हदू अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह
मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद सल्ल.
ईश्वर के अन्तिम संदेष्टा हैं।

ह्या ‘अलास्सलाह, ह्या ‘अलास्सलाह

आओ नमाज़ की तरफ़।

हया ‘अलल फलाह, हया ‘अलल फलाह

आओ कामयाबी की तरफ़।

अस्‍सलातु खैरूं मिनन नउम
अस्‍सलातु खैरूं मिनन नउम
(ये बोल केवल सुबह (फज़र) की अज़ान में कहे जाते हैं)

नमाज़ सोए रहने से बेहतर है। यानी नींद से अच्छी ईश्वर की प्रार्थना है

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर

ईश्वर सब से महान है।

ला-इलाहा इल्लल्लाह

अल्लाह के सिवाए कोई माबूद नहीं।

यह आजान है और अगर इसका अर्थ समझने के बाद भी यदि कोई इस पर विवाद करता है तो यकीनन वह रब का दुश्मन है और ऐसा माना जाता रहा है जिसने भी ईश्वर के कामों में बाधा उत्पन्न की है वो तबाह और बर्बाद हो गया



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